चुनाव सुधारों की गाड़ी अपने निर्धारित समय से लेट चल रही है
चुनाव आयोग कृपया ध्यान दें
चुनाव सुधारों की गाड़ी अपने निर्धारित समय से लेट चल रही है
राजस्थान सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव समाप्त हो गए हैं और वहां नई सरकारों के गठन की तैयारियां अन्तिम चरण में है।लेकिन इन चुनावों में भी चुनाव सुधारों के लिए किए गए प्रयासों का कोई खास असर देखने को नहीं मिला है।
आचार संहिता की जमकर धज्जियां उड़ाई गई हैं। किसी भी प्रत्याशी को किसी प्रकार की कोई चिंता नहीं थी। उन्हें पता था कि चुनावों में शिकायतें होती है लेकिन यहां कार्रवाई कौन करता है। और हुआ भी ऐसा ही।
निर्वाचन विभाग के पास आचार संहिता उल्लंघन की ढेरों शिकायतें हैं जिनमें से कुछ एक में नोटिस की औपचारिकताएं पूरी कर ली गई लेकिन हजारों शिकायतें यूं ही छोड़ दी गई हैं।
विधायक निर्वाचित भी हो गए हैं और एक आध दिन में शपथ भी लेंगे और फिर उन शिकायतों का क्या होना है। अब 21वीं सदी में ये तो कम से तय हो जाना चाहिए कि भारत में चुनाव लड़ने वाली पार्टियां और प्रत्याशी कम से कम शुचिता का चुनाव लड़ें।
इन चुनावों में क्या नहीं हुआ?
शराब भी वितरित हुई। नोट भी बांटे गए। भाईचारों और सौहार्द खत्म करने के बयान भी दिए गए। धार्मिक स्थलों, धार्मिक समारोहों का प्रचार के लिए उपयोग भी किया गया। विजय जुलुसों पर पाबन्दी के बावजूद ऐसे जुलुस भी निकले।
तय चुनाव खर्च सीमा से कई गुणा अधिक पैसा भी खर्च किया गया। हालांकि चुनाव सुधारों के लिए उठाए गए कई कदमों केसकारात्मक परिणाम भी मिले हैं। मतदान प्रतिशत में लगातार वृद्धि हो रही है। इस बार घर से वोटिंग का बहुत ही उम्दा कदम रहा जिसकी वजह से वृद्ध, बीमार और दिव्यांग मतदाता वोट डाल सके और मतदान के अधिकार से वंचित नहीं रहे। साथ प्रत्याशियों के प्रचार की वीडियोग्राफी भी बड़ा कदम है।
नोटा का सही उपयोग तय किया जाना चाहिए
भारत के निर्वाचन आयोग ने नापसन्दगी के वोट का अधिकार नोटा के जरिए दे तो दिया लेकिन इस नोटा का उपयोग क्या है? जब तक नोटा का सदुपयोग तय नहीं होगा तब तक न तो इस वोटका किसी का डर होगा और न ही ये वोट किसी काम है।
होना यह चाहिए कि नोटा वोट की कोई संख्या तय की जाए और उतने वोट नोटा को मिल जाए तो संबंधित क्षेत्र में दोबारा नए उम्मीदवार लाकर चुनाव कराएं जाएं। तभी नोटा की उपयोगिता होगी अन्यथा यह वोट जमीनी स्तर पर किसी का काम नहीं है।
जुलुस निकालने वालों का निर्वाचन रद्द होने का डर हो
चुनाव जीतने के बाद विजयी जुलुस निकालने पर कड़ा प्रतिबंध होना चाहिए। कई बार इन जुलुसों के दौरान माहौल बहुत तनावपूर्ण हो जाता है। निर्वाचन विभाग इस पर रोक तो लगाता है लेकिन इसके बावजूद विजय जुलुस निकाले जाते हैं।
किसी प्रत्याशी को इसका डर ही नहीं है। परिणाम वाले दिन जयपुर के गांधीनगर सर्किल पर यदि पुलिस नहीं होती तो विपरीत विचारधाराओं वाली पार्टी के समर्थकों के बीच तगड़ी झड़प तय थी। इसी प्रकार आगरा रोड पर विजय जुलुस के दौरान हजारों को राहगीरों को एक घण्टे तक जाम में फंसना पड़ा।
आचार संहिता की शिकायतों का परिणाम से पहले-पहले निर्धारण हो
आचार संहिता की शिकायतों का कोई समाधान देखने को नहीं मिलता। राजस्थान में सैंकड़ों शिकायतें मिली लेकिन कुछ शिकायतों में नोटिस देकर इतिश्री कर ली गई। इस वजह से प्रत्याशी को इसकी परवाह नहीं होती। आज तक कोई ऐसा उदाहरण भी देखने को नहीं मिला है कि चुनाव होने के बाद किसी आचार संहिता की शिकायत को लेकर कोई बड़ी कार्रवाई सामने आई हो।
यही कारण है कि प्रत्याशी भी इसे लीपा-पोती ही मानते हैं। जबकि होना ये चाहिए कि आचार संहिता की शिकायतों का चुनाव परिणाम आने से पहले निर्धारण हो और शिकायत सही पाने जाने की स्थिति में संबंधित प्रत्याशी के खिलाफ कोई प्रावधान होने चाहिए जिससे आचार संहिता उल्लंघन को लेकर भय रहे।
नाकाबंदी में आमजन परेशान होता है
आचार संहिता के दौरान करीब डेढ़ माह तक चलने वाली नाकाबंदी और जांच पड़ताल में आम आदमी काफी परेशान होता है। पैसे और शराब के अनुचित उपयोग को रोकने के लिए ऐसे प्रावधान किए गए हैं लेकिन देखने को ये आया है कि प्रत्याशियों का कोई अनुचित पैसा नहीं पकड़ा गया और आमजन का पैसा जब्त हुआ और उसे परेशानी का सामना करना पड़ा।
शराब तो पकड़ी गई लेकिन इसके नतीजे आज तक सामने नहीं आए कि शराब किस प्रत्याशी द्वारा मंगवाई गई थी। सामने तो यही आया कि हमेशा की तरह शराब भी बंटी, लंगर भी चले और पैसे भी बंटे।
चुनाव खर्च के हिसाब का वेरिफिकेशन ठोस हो
निर्वाचन आयोग की तरफ से प्रत्याशी के लिए चुनाव खर्च की सीमा तय होती है। इससे अधिक खर्च नहीं किया जा सकता लेकिन प्रत्याशी निर्धारित सीमा से चार-पांच गुणा और कहीं-कहीं तो दस-दस गुणा तक पैसा खर्च कर डालते हैं। किसी ने दस चाय प्रतिदिन पिलाकर चुनाव लड़ लिया, क्या संभव है? चुनाव की खर्च की झोलझाल और इसके वेरिफिकेशन के लिए कोई ठोस व्यवस्था होनी बहुत जरूरी है।
पत्रकार - रोशनलाल शर्मा
स्वतंत्र पत्रकार

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